Friday, July 11, 2014

बज़ट 2014 : कांग्रेसमुक्त मोदी सरकार का घोर 'कांग्रेसी' बजट ! (क्रमशः जारी )

इसे ट्रेजडी कहें या प्रहसन, लेकिन सच्चाई यही है कि कांग्रेसमुक्त मोदी सरकार आर्थिक नीतियों के मामले में कॉंग्रेस के पद चिन्हों पर ही चल रही है. आम ग़रीब और मेहनतकश जनता, जिसने भी बड़े अरमानों से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में अपना योगदान दिया था/है, उनके लिए तो यह ट्रेजडी से कम नहीं ही है. और स्वयं नरेंद्र मोदी और पूरे मोदी ब्रिगेड, जिन्होनें आम जनों को कांग्रेसमुक्त भारत बनाने का सुनहरे स्वप्न दिखाए थे, के लिए यह निश्चय ही एक घटिए किस्म का प्रहसन हैं जिनके पात्रों को यह साबित करना (दोनों पक्षों - आम जनता और पूंजीपतियों व बाज़ार के ख़ूँख़ार गिरोहों दोनों - के समक्ष) मुश्किल हो रहा है कि यह बज़ट किस तरह से कांग्रेसमुक्त है और यह किस तरह पुराने डराबने सपनों में आने वालीे प्रेतछायायों से मुक्त हैं. 2014 का बजट पहले की ही तरह घोर रूप से पूंजीपक्षीय नीतियों का पुलिन्दा भर हैं। नवउदारवाद का वही पुराना मंत्रोचार इस बज़ट में भी किया गया है.अगर कहीं फ़र्क दिखता है, तो वह फ़र्क यही कि इस बज़ट में मोदी सरकार ने नवउदारवादी कदमों को सामाजिक और कल्याणकारी योजनाओं के ज़रिए मानवीय चेहरा भी प्रदान करने की भी ऐसी कोई खास कोशिश नहीं की है. उल्टे, सामाजिक और कल्याणकारी मदों में या तो कटौती की गयी है या बहुत कम वृद्धि की गयी है या फिर उन्हें जस का तस छोड़ दिया गया है जिसका अर्थ रियल टर्म (मौज़ूदा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की दृष्टि से) में कटौती ही होगा. आइए, थोड़ा विस्तार से चर्चा करें.......
नवउदारवाद को किन चीज़ों के लिए जाना जाता है? यह किन बातों अथवा चीज़ों का पर्याय और परिचायक है? सर्वप्रथम इसे हम निम्नलिखित बिंदुओं के तहत श्रेणीबद्ध कर सकते हैं...

1. सरकारी खर्च में कटौती और वित्तीय घाटा पर पूर्ण बंदिश
2. आम जनता को राहत पहुँचाने वाले तमाम कार्यक्रमों पर क्रमशः रोक
3. कृषि, उद्योग और सेवा सभी क्षेत्रों में से सरकार द्वारा अपने हाथ खींच लेना
4. श्रम मानकों को सख़्त और पूंजी मानकों को लचीला बनाना
5. श्रम क़ानूनों को क्रमशः लचीले होते पूंजी के मानकों व हितों के अनुरूप ढालते चले जाना
5. संगठित और औपचारिक क्षेत्र को क्रमशः छोटा बनाते हुए उसे पूंजी के साथ जोड़े व मिलाए रखना
6. असंगठित व अनौपचारिक क्षेत्र के दायरे को बढ़ाते हुए उसका अमानवीय शोषण की खुली छूट
7. पूंजी और ख़ासकर बाज़ार को अपने अंधे और अतर्किक नियमों को खुली छूट
8. कल्याणकारी कार्यक्रमों और सरकार की सामाजिक ज़िम्मेदारियों से क्रमशः पूर्ण वापसी...
9. और इससे निर्मित ग़रीबों व कंगालो की फ़ौज़ को पूंजी की सेवा हेतु जीवित रखने की ज़िम्मेवारी से भी मुँह मोड़ लेने की प्रवृति  

मोटा-मोटी ये हैं नव उदारवाद के मूलमंत्र और मोदी सरकार अक्षरशः इन्हीं कदमों पर चल रही है. हम देख सकते हैं कि सरकारी खर्च में अधिकाधिक कटौती और पूंजी के हितों के पूर्ण प्रश्रय और संरक्षण के आधार पर जी.डी.पी.वृद्धि की कोशिश एक ही अर्थ हो सकता है - पूंजी के संकेंद्रण और केंद्रीकरण को खुली और बेलगाम छूट. यह स्वाभाविक रूप से ग़रीबों के उतरोत्तर अधिकाधिक दरिद्रीकरण, पूंजी के छोटे स्वामियों व प्रत्यक्ष उत्पादकों के संपत्तिहरण व स्वत्वहरण को और तेज करेगा और इस तरह इन सबके परिणामस्वरूप स्वयं पूंजी के परिचालन के क्षेत्र को उतरोत्तर कम करेगा. यह उलट कर अपनी बारी में और भी गहरे व तीखे आर्थिक संकटों को जन्म देगा...इसीलिए नवउदारवाद से अर्थव्यवस्था का संकट दूर होगा ऐसा सोचने वाले और कोई नहीं पूंजी के जरखरीद कलमघिस्सू गुलाम ही होंगे और कोई नहीं.

बजट में उल्लिखित प्रस्तावों की चर्चा करें तो निम्नलिखित बिंदु उभरते हैं..

1. प्रत्यक्ष टैक्स में बेसिक लिमिट/स्लॅब में तथा पी.पी.एफ.में 50000/ की छूट तथा होम लोन की ब्याज दर में थोड़ी छूट  :- ये सभी छूटें कहीं से भी 60-70 फीसदी ग़रीब व बेरोज़गार तथा मेहनतकश आबादी के लिए कोई मायने नहीं रखती हैं। यह मूलतः पूंजीपतियों और निम्न पूंजीपतियों (मध्य वर्ग) की ही भिन्न-भिन्न श्रेणियों के काम आएगी. हाँ, संगठित क्षेत्र के अपेक्षाकृत उच्च वेतनभोगी मज़दूर और राज्य व केन्द्र के  कर्मचारी भी इनसे लाभान्वित होंगे और जिससे मज़दूरों का यह तबका सरकार का समर्थक बन सकता है। इससे सुविधापरस्त और आर्थिक रूप से पूरी तरह विपन्न मज़दूरों के बीच खाई पैदा करने मे सरकर को ओर सुविधा होगी। संगठित और असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के बीच की खाई और चौड़ी होगी।  

2. सिर्फ यही नहीं, अमीरों यानि अमीर करदाताओं के लिए रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REITs) बनाये जाएंगे जिनमें वे बचतपूर्वक निवेष कर सकते हैं। इसी तरह से,  उनके लिए ही रिटायरमेंट फ़ण्ड भी बनाएं के प्रस्ताव हैँ. "इकोनॉमिक टाइम्स" लिखता हैं - " .... however, the redeeming factor is that the budget paves the way for launch of real-estate investment trusts (REITs) that rich taxpayers could invest in. Also, the launch of retirement funds could help them save for retirement in a more transparent and cost-effective manner."

3. समाज का जो बहुत बड़ा मेहनतकश और गऱीब तबका महंगाइ की मार से सबसे असुरक्षित है, उसके लिए इस बजट में कुछ भी नहीं है। यहाँ तक कि न्यूनतम मज़दूरी के बारे में एक शब्द तक नहीं है।     

Tuesday, July 8, 2014

  • पूंजीवादी विपक्षी पार्टियाँ रेलवे बज़ट को दिशाहीन बता रही हैं. यह.सच नहीं है. ऐसा कहने के पीछे उनकी मंशा भी स्पष्ट है. वे देश में चल रही घोर रूप से पूंजीपक्षीय नीतियों पर चर्चा न हो यह चाहते हैं. सच्चाई यही है कि रेलवे बजट की दिशा सुस्पष्ट है. और वह दिशा है देश में पहले से ही जारी वह दिशा जिसे हम कुख्यात नवउदारवाद की दिशा के नाम से जानते हैं. मोदी सरकार के ( प्रथम) रेलवे बज़ट 2014 में देश में जारी वही पुराने 'कांग्रेसी' पूंजीपक्षीय आर्थिक सुधारॉं की निरंतरता का सहज़ बोध होता है. कोई भी बज़ट को देखकर यह समझ सकता है. निजीकरण और विनेवेशीकरण का वहीं घोर पूंजीपक्षीय ज़ोर, वही एफ.डी.आई., रेलवे जैसी देश की बहुमूल्य संपदा को बेचने की पहले ही जैसी तैयारी और इसके लिए वही पुराने घिसे-पिटे तर्क, कम आय वाले यात्रियों की सुविधाओं के प्रति वही दुराव व उपेक्षा की पुरानी भावना, आम यात्रियों व रेलवे की सुरक्षा के प्रति वही लापरवाही भरा नज़रिया और लचर नीति ..जी हाँ, सब कुछ पहले जैसा ही है. बल्कि, यह कहना चाहिए कि उसी पुरानी दिशा में जाने की रफ़्तार और तेज हो गयी है. पहले से ही छोटे-छोटे हिस्सों में बेची जा रही रेलवे को जल्द ही पूरी तरह से और तेज़ी से बेचने की नीतियों की स्पष्ट झलक इस रेलवे बज़ट में देखी जा सकती है. तब रेल भाड़ा का क्या होगा इसकी बस कल्पना की जा सकती है. और इसके तर्क ? वही 'कांग्रेसी' अर्थात खांटी रूप से पूंजीपक्षीय- नवउदारवादी तर्क हैं  जिन्हें कल तक कांग्रेस देती थी लेकिन आज़ मोदी सरकार द्वारा आज़ दिए जा रहे है, याने, कहा जा रहा है कि आख़िर रेलवे के विकास के लिए पैसा कहाँ से आएगा? हम जानते हैं कि रेल भाड़ा में वृद्धि के लिए भी यही तर्क दिया गया था. कोई इनसे पूछे तो सही कि बुलेट ट्रेन में अरबों रुपये किसके लिए और किसकी इज़ाज़त से फूँके जा रहे हैं? आख़िर इसकी माँग किस जनता ने की थी? रेलवे मंत्रालय के भारी भरकम खर्च को आम जनता क्यों ढोती रहे? पर सवाल है, जनता के अंदर इन सुलगते-जलते प्रश्नों का जवाब देने की किसे पड़ी है ? कौन है जो आम जनता की बात भी सुनने के लिए भी तैयार है? मार्क्स ने कहा है न - " अगर मज़दूर वर्ग क्रांतिकारी नहीं हैं, तो कुछ भी नहीं है." इसी को हम इस तरह कह सकते हैं कि - "आम जन साधारण लोग क्रांतिकारी नहीं हैं, तो वे कुछ भी नहीं हैं." और उनकी सुनने वाला भी कोई नहीं होगा.यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे अब किसी प्रमाण की कोई ज़रूरत नहीं है.    
    Posted 4 minutes ago by Shekhar Sinha



Sunday, July 6, 2014

"गरम रोला मज़दूर आंदोलन" और हमारा रवैया

"गरम रोला मज़दूर आंदोलन" भारत के मज़दूर वर्ग के आंदोलन का एक हिस्सा है. हम मानते हैं कि इसके समर्थन में खड़ा होना तमाम मज़दूर वर्गीय ताकतों का फौरी कर्तव्य है. इसके नेतृत्व में आज़ कौन, वह किस तरह का व्यवहार कर रहा है, या वह किसी और को इस आंदोलन में शामिल कर रहा है या नहीं, वह संयुक्त आंदोलन के प्रति ज़िम्मेवार और गंभीर है या नहीं ...इन मुद्दों को मज़दूर आंदोलन के समर्थन में खड़ा होनेे में बाधा बना लेने का मतलब है कि एक तरह की गुटीय करवाई के विरुद्ध एक और दूसरे तरह की गुटीय कार्रवाई में उतर जाना और मज़दूर आंदोलन के दूरगामी हितों की अनदेखी कर देना. अगर किसी संगठन की कमियों को उजागर भी करना है, उनका पर्दाफाश करना है और/या उन्हें दुरुस्त करना है, तो इसके लिए भी ज़रूरी है कि इसमें समस्त मज़दूर आंदोलन के दूरगामी हितों और उसके उच्चतर लक्ष्यों को सामने लाते हुए गैर-गुटीय तौर पर अंदर और बाहर दोनो तरफ से, जैसा मौका हो, हस्तक्षेप करना चाहिए.......आख़िर एक वाज़िब मज़दूर आंदोलन के समर्थन से हम अपना मुँह कैसे मोड़ सकते हैं? गरम रोला के वर्तमान नेतृत्व ने अगर दिल्ली में इस आंदोलन में और दूसरे संगठनों को शामिल नहीं किया, तो भी आंदोलन के समर्थन में खड़ा होने की ज़रूरत है, यह सोचना कि चलो आंदोलन मार खा जाए तो अच्छा है, तभी इन्हें पता चलेगा और हेंकड़ी निकलेगी, तो हमें यह प्रतीत होता है कि यह भी एक तरह की गुटीय सोच का परिचायक ही है. इसे अंततः एक गुटीय कार्रवाई के खिलाफ एक गुटीय प्रतिक्रिया ही कहा जाएगा. इससे आंदोलन को अंततः कोई फ़ायदा नहीं होता है और न ही हम आंदोलन में मौज़ूद ग़लत प्रवृतियों का ही पर्दाफाश कर पाते है, उल्टे, मज़दूरों व मज़दूर आंदोलन के अंदर व्याप्त गुटीय मानसिकता को ही हम और मज़बूती प्रदान किए देते हैं
हम सभी मज़दूर वर्गीय ताकतों से इस (उपरोक्त) बात पर गंभीरता से विचार करने की अपील करते है और साथ ही गरम रोला मज़दूर आंदोलन में लगे मज़दूरों और उनके नेताओं से भी अपील करते हैं कि दूसरों (अन्य संगठनों) के पर्ति अपने व्यवहार में परिवर्तन लाएँ और शालीन होना सीखें.यह उनके लिए और आंदोलन के लिए श्रेयस्कर ही नहीं ज़रूरी है, अन्यथा अंततः इसका खामियाज़ा उन्हें ही उठाना पड़ेगा..आंदोलन के साथ जो हो रहा है वह तो हो ही रहा है. हम उम्मीद करते हैं कि साथीगण हमारी सलाह और सदिच्छा को यथोचित कम्युनिस्ट भावना के साथ लेंगे...

Saturday, June 28, 2014

वह दिन जल्द ही आने वाला है जब देश की सम्पदा पर कब्ज़ा जमाए अम्बानियों (पूंजीपतियों) और उनके सरकारी व गैर सरकारी दलालों को भारत्त की मेहनतकश ज़नता  माकूल सजा देगी! 

देश की गैस संपदा किसकी है? जनता की या अंबानी की? इस देश का संविधान कहता है इस देश की धरती के अंदर और आकाश में मौज़ूद सारी संपदा का असली और अंतिम मालिक स्वयं देश की जनता है। फिर यह कैसे हो रहा है कि अंबानी के साथ मिलकर हमारी ही चुनी हुई सरकार हमें ही चुना लगाने पर तुली हुई है? और क्या हम अंबानी/अंबानियों और सरकार को सबक नहीं सीखा सकते हैं? अगर हाँ, तो कैसे?

आज़ गैस के दाम आसमान छू रहे हैं. इसमें सरकार और रिलाएँस दोनों जनता के साथ मनमानी कर रहे हैं. पहले यह देखें कि कुएं अम्बानी ने किस तरह हथियाये। अम्बानी के KG बेसिन का मालिक बनने की कहानी बहुत दिलचस्प है जो बताती है कि हमारे देश का जनतंत्र वास्तव मे क़िस तरह का जनतंत्र हैं। दरअसल जनतंत्र के नाम पर एक डाकेजनी क़ी वयवस्था चल रही हैं।

KG बेसिन क्या है? KG बेसिन यानी कृष्णा गोदावरी बेसिन आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र में कृष्णा और गोदावरी नदी किनारे करीब 50000 स्क्वायर किलोमीटर में फैला वह इलाका हैं जहाँ के एक हिस्से में रिलायंस इंडस्ट्री ने देश के सबसे बड़े गैस के भण्डार का पता लगाया था। इसे ही KG D6  अर्थात KG धीरुभाई-6 कहा जाता है। यह 7645 स्क्वायर किलोमीटर का एरिया है और इसमें जिस खास जगह पर गैस का पता लगा उस जगह को KG-DWN-98/1 कहा जाता है। इस बेसिन के रिलायंस के हाथ में जाने की कहानी 1991 में शुरू हुई निजीकरण कि नीतियों से जुडी है जिसके तहत भारत सरकार ने कई भारतीय निजी कंपनियों और विदेशी कंपनियों को तेल की खोज और उसके उत्पादन में शामिल किया। लेकिन फिर 1999 में, वाजपेयी की सरकार ने  न्यू एक्सप्लोरेशन एंड लाइसेंसिंग पालिसी (NELP) लाकर छोटे-छोटे ब्लॉक्स, जो अलग-अलग कंपनियों को दिए जा रहे थे, को बंद करके एकमुश्त एक बड़ा ब्लाक, अर्थात KG D6, रिलायंस को दे दिया गया। इस तरह से रिलायंस का इस क्षेत्र में एकाधिकार दिया गया।

इसमें सरकार के अपने तर्क है? उसका कहना है कि जो इस काम में सक्षम हैं उनको ही तो दिया तेल उत्पादन का काम दिया जाना चाहिए। अब यह सवाल बेमानी है कि "बेसिन तो रिलायंस को दे दिया गया, पर क्या सरकार का उस पर नियंत्रण है?" जब एकाधिकार ही दे दिया गया, तो सरकार का नियंत्रण क्योँ और कीस तरह रहेंगा ? यह तो कहने भर की बात है कि "क्योंकि कोई भी प्राकृतिक सम्पदा देश के जनता की होती है. इसीलिए सरकार इस एक्सप्लोरेशन और प्रोडक्शन को मॉनिटर करती है।"  कहने के लिए हम कह सकते है क़ि "प्राकृतिक सम्पदा को निजी कंपनी कैसे निकालती और बेचती है इसे मॉनिटर करने के लिए सरकार प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (PSC) के तहत निजी कंपनियों के साथ समझौता और उन पर निगरानी करती है" आदि आदि, लेकिन सच्चाई यही है कि यह सब सिर्फ दिखाबे के लिए होता है। दिखाबे के तहत ही PSC के बारे में कहा जाता है कि  यह "दरअसल एक कॉन्ट्रैक्ट है जिसमें खरीदने और बेचने वाली पार्टी के लिए नियम कानून तय किये गए हैं।" फिर यह भी कहा जाता है कि "प्राकृतिक सम्पदा की खोज करने से लेकर उस सम्पदा को निकाल कर बेचने तक कौन-कौन से प्रक्रियाओं को फॉलो करना है… साथ ही इस कॉन्ट्रैक्ट में मुनाफे का बंटवारा कैसे होगा… इसकी भी एक कानूनी प्रक्रिया है और इस कॉन्ट्रैक्ट का उल्लंघन न हो, इस बात को तय करने के लिए डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ हाइड्रोकार्बन (DGH) भी नियुक्त किया गया है",  लेकिन हम जानते है कि इस PAC कॉन्ट्रैक्ट, जिस पर रिलायंस और भारत सरकार ने साईन किया है, का आज क्या हश्र हो चुका है।

अब आगे बढ़ें।  जून 2004 में NTPC ने 2600 मेगावाट वाले अपने दो पॉवर प्लांट (कवास और गंधार में मौजूद है) के लिए बोली लगाती है रिलायंस को NTPC को 17 साल तक 2.34$ के हिसाब से 132 ट्रिलियन यूनिट गैस देने का ठेका मिल जाता है। लेकिन कुछ ही दिनों बाद रिलायंस ने  NTPC को 2.34$ के हिसाब से गैस देने से मना कर दिया. NTPC ने रिलायंस को मुंबई कोर्ट में घसीटा, लेकिन 20 दिसंबर 2005 से लेकर 2014 तक  9 साल बाद भी यह ख़त्म नहीं हो पाया है. NTPC जैसी संस्था के साथ इतने बड़े धोखें के बावजूद सरकार चुपचाप देखती रही।  सरकार को रिलायंस पर चाबूक चलाकर उसे सबक सिखाना चाहिए था, लेकिन उलटे 2007 में, जब NTPC और रिलायंस का झगड़ा कोर्ट में चल ही रहा रहा था, सरकार ने इस मामले को एमपावर्ड ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स (EGOM) के सुपुर्द कर के, जिसकी अध्यक्षता अभी के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी खुद कर रहे थे, 2.34$ की दर को बढ़ा कर 4.2$ कर देने का फैसला कर दिया! यह था रिलायंस  मोनोपोली क़ा प्रभाव, जो बिलकुल स्पष्ट है और कोई भी देख और समझ सकता है। 

कोई पूछ सकता है कि रेट बढ़ाने का आखिर कोइ तो आधार होगा। लेकिन यह जानकर किसी को भी आश्चर्य होगा कि दाम बढ़ाने-घटाने और कोर्ट कचहरी आदि का खेल तब चल रह था जब जब KG बेसिन से एक ग्राम गैस भी नहीं निकाली गयी थी। बेसिन बंद था. दरअसल यह सब दाम/रेट बढ़ाने हेतु दबाव बनाने के लिए ही किया गया था।  जैसे ही दाम 4.2$ किया गया, वैसे ही रिलायंस ने गैस निकलना शुरू कर दिया। इस पर एक पूरा का पूरा नाटक रचा गए और फिर उसे मंचित किया गया।  रिलायंस ने ही सरकार को एक फार्मूला दिया था कि उन कंपनियों को, जो रिलायंस से गैस लेना चाहते थे, एक ख़ास रेट/ दाम (4.54$ और 4.75$ के बीच) बताया जाय। फिर रिलायंस ने ही EGOM को दाम 4.59$ कर देने को कहा। बाद में रिलायंस ने इसे भी कम करके 4.3$ कर दिया. इसके बाद प्रणब मुखर्जी ने इसमें मामूली कटौती करके 4.2$ कर दिया और अपनी पीठ थपथपाई कि न उसकी चली, न इसकी चलेगी, चलेगी तो सिर्फ हमारी ही चलेगी. इस तरह रिलायंस और सरकार ने मिलकर इस ड्रामे को अंजाम तक पहुँचाया। इस ड्रामे पर भारत सरकार के पॉवर एंड एनर्जी विंग के प्रिंसिपल एडवाइजर सूर्या पी सेठी ने आपत्ति भीं की थीं, लेकिन उनकी सुनने वाला कौन था? उनका कहना था कि "विश्व में कहीं भी गैस की कीमत 1.43$ से ज्यादा नहीं है, फिर अपने ही देश के कुएं से लोग 4.2$ में गैस क्यों लें?"

यही नहीं, "2011 की कैग की रिपोर्ट के अनुसार बिना कोई कुआँ खोदे रिलायंस पेट्रोलियम मिलने के दावे करती रही. मतलब खुद रिलायंस को नहीं पता था कि कितना गैस कितने कुओं में है। रिलायंस को केवल 25% हिस्से पर काम करना था, लेकिन PSC के कॉन्ट्रैक्ट के खिलाफ जाकर रिलायंस ने समूचे बेसिन में काम शुरू कर दिया था और सरकार ने इसमें कोई टोका टाकी तक नहीं की।"

लेकिन रिलायंस के मुनाफे की भूख तो असीमित हैं। 4.2$ के रेट पर भी वह कब तक ठहरती? जब भाजपा की मोदी सरकार बनी, उसके पहले ही मोदी को समर्थन औऱ सहयोग देने के बदले इस रेट को बढ़ाकर 8$ करने का कॉन्ट्रैक्ट मोदी और भाजपा से हो गया था, इस बात का प्रमाण यह है कि मोदी की सरकार आते है इस 4.2$ के रेट को बढ़ाकर 8$ कर दिया गया है।  इसी बेसिन से बंगलादेश को यही गैस करीब 2$ में दिया जाता है !! अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भी यह रेट नहीं है। दुनिया में केवल 1.43$ के रेट से लोगों को गैस मिल रहा है।


Saturday, June 21, 2014

19 जून 2014 को मोदी सरकार द्वारा की जा रही वादाखिलाफी के विरुद्ध pdyf-iftu संयुक्त रैली दोपहर 4.35 बजे हरिपुर गायाघाटा मोड़ से शुरू हुई और चिचुड़िया मोड़ आदि होते हुए खासकेंदा मोड़ तक और फिर वहां से 6.40 बजे शाम को हरिपुर iftu सेंट्रल ऑफिस के पास आ कर ख़त्म हो गयी। तब तक बारिश शुरू हो चुकी थी और इसीलिए सभा करने का प्रोग्राम नहीं हो सका. इसमें लगभग दो घंटे से भी अधिक समय लग गया। यह प्रतिवाद रैली  देश व पश्चिम बंगाल में मज़दूर वर्ग व आम जनता के हितों के ऊपर लगातार किये जा रहे कुठारघातों और खासकर केंद्र में बनी नयी मोदी सरकार के द्वारा जनता से किये गए वादे से की जा रही वादाखिलाफी  के विरुद्ध तथा बंगाल जूट मिल मज़दूरों की चल रही हड़ताल और लड़ाई के समर्थन में समर्थन में किया गया। सैंकड़ों की संख्या में जुटे स्थानीय कार्यकर्ताओं ने अच्छी संख्या में बड़े-बड़े प्ले कार्ड्स ले रखे थे। नौजवान मज़दूर साथी आगे-आगे चल रहे थे और गगनभेदी नारे लग रहे थे। 
बंगाल की परंपरा के विपरीत पुलिस शुरू से ही व्यवधान डालने में लग गयी। "परमिशन है कि नहीं" की एक नयी तरह की चाल चलकर रैली को डिस्टर्ब करने की कोशिश की गयी। अंततः परमिशन लेने की जरूरत पर ही सवाल करते हुए साथियों ने, ख़ास कर युवा साथियों ने, मुस्तैदी से पुलिस हस्तक्षेप का विरोध किया। इफ्टू से भी आगे बढ़कर pdyf  के साथियों ने इसके विरोध में हिस्सा लिया। पुलिस से साफ़ कह दिया गया कि ऐसी स्थानीय दिन-प्रतिदिन की प्रतिवाद रैलियों के लिए न तो परमिशन लिया गया है और न ही भविष्य में कभी लिया जाएगा।  

इस  तरह के प्रतिवाद सभा अन्य दुसरे क्षेत्रों में भी लेने की बात की गयी।  

प्ले कार्ड्स पर हिंदी और बांग्ला दोनों भाषाओं में निम्नलिखित नारे लिखे थे ----

* मात्र 15 दिनों में जनता दर्जन भर वायदे तोड़ने वाली मोदी सरकार होश में आओ।  
* महंगाई रोकने का झूठा कांग्रेसी वादा नहीं, जमाखोरों को तुरंत गिरफ्तार करो और महंगाई पर तुरंत रोक लगाओ। 
* जनता का खून चूसने वाले जमाखोरों-कालाबाजारियों पर करवाई करो, अन्यथा इनसे जनता को स्वयं निपटने देने का अधिकार दो। 
* पेंशन, बीमा, पीएफ, रेलवे, रक्षा क्षेत्र सहित सभी अन्य क्षेत्रों में प्रस्तावित एफडीआई वापस लो। 
* एफ.डी. आइ. के नाम पर देश के अमूल्य संसाधनो को विदेशी पञ्जीपतियों की लूट का चारागाह बनाना बंद करो 
* देश में फन फैलाये नव फासीवाद को करने के लिए सर्वहाराओं-मेहनतकशॉ का नॉन पार्टी नॉन पार्लियामेंट्री संयुक्त मोर्चा कायम करें। * बंगाल के हुगली जूट मिल के सी ई ओ की हत्या में निर्दोष मज़दूरों को फंसाना बंद करो, गिरफ्तार मज़दूरों को रिहा करो। 
* बंगाल के संकटग्रस्त जूट मिलो के संघर्षरत मज़दूरों का संघर्ष जिंदाबाद!
* आज जूट मिल संकट है, तो कल ई. सी. एल. का सकट होगा, मज़दूरों का एकताबद्ध संघर्ष ही एकमात्र एकमात्र रास्ता है। 
*बंगाल जूट मिल के पूंजीवादी संकट की सजा मज़दूरों को क्यों, माँ, माँटि और मानुष की सरकार जवाब दो।
* पूंजीवाद के खात्मे के बगैर मज़दूरों के जीवन में कोई बुनियादी सुधार संभव नहीं है। 
* बंगाल के क्रांतिकारी मज़दूर आंदोलन के पुराने गौरव को हासिल करने के लिए आइ. एफ. टी. यू. के इर्द-गिर्द जमा हों। 
* संगठित और असंगठित मज़दूर भाइयों ! संघर्ष आपकी मज़बूरी बन जाए, इससे पहले ही संघर्ष के लिए एकजुट होइए।
* नरेंद्र मोदी जी !  जनता से किए अपने वायदे पूरे करिये, न कि अपने विरोधियों की आवाज़ को दवाने की कोशिश करिए।
* विरोध जताने के जनवादी अधिकारों पर पूरे देश में हो रहे फासीवादी हमलों और गिरफ्तारियों पर रोक लगाओ। 

* भ्रष्टाचार, कालाधन, महंगाई, बेरोजगारी, कंगाली आदि खत्म करने और "अच्छे दिन" के वायदे पूरे करो, नहीं तो जान संघर्षो का सामना करने के लिए तैयार रहो.            







































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Wednesday, June 18, 2014

19 जून 2014 को दोपहर के बाद हरिपुर (रानीगंज कोयलांचल) में प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक युथ फ्रंट (पी.डी.वाई.एफ ) तथा इंडियन फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन (इफ्टू) की और से देश व पश्चिम बंगाल में मज़दूर वर्ग व आम जनता के हितों के ऊपर लगातार किये जा रहे कुठारघातों, खासकर केंद्र में बनी नयी मोदी सरकार के द्वारा जनता से किये गए वादे से की जा रही वादाखिलाफी  के विरुद्ध प्रदर्शन और प्रतिवाद सभा
ये नारे हैं : ------

















Friday, May 16, 2014

मोदी-आर.एस.एस.-भाजपा ब्रांड की जीत और आगे का रास्ता 


आरएसएस- भाजपा- मोदी ब्रांड फासीवादियों को मिली प्रचंड विजय का बहादुरी से सामना करें, जल्द ही फासीवादियों के झूठे वादों की कलई खुलेगी और देश जनांदालनों की राह पर होगा. आगामी संघर्षों व फासीवाद विरोधी राजनीतिक अभियानों की तैयारी में लगें

हमारी पार्टी फिर दुहराती है, अपना पूरा काला फन फैलाने के लिए बेकरार ज़हरीले फासीवाद को परास्त और पराजित करने के लिए सर्वहाराओं व मेहनतकश अवाम की एकजुट ताक़त को जगाने का, उनकी खंड-खंड विखंडित अगुआ ताकतों को क्रांतिकारी कार्यक्रम के आधार पर संगठित करने का और सीधे संघर्ष व लड़ाई के मैदान से तमाम वास्तविक फासीवाद विरोधी शक्तियों को आगामी महाअभियानों के लिए आह्वान करने का रास्ता ही एकमात्र रास्ता है. आज़ की परिस्थिति में इससे मुँह मोडने वाले या तो कुपमांडूक नौसिखुआ हैं या फिर जनता के गाढ़े वक्त में पूंछ दवाकर भागने की तैयारी करने वाले लाचार डरपोक भगोड़े ....

हाँ, एक बात और. मोदी और ममता की आँधी ने समुचे पार्लियामेंटरी लेफ्ट (सीपीआई-सीपीएम व अन्य) को सीटों की संख्या के तौर पर भले ही ध्वस्त कर दिया है, लेकिन हमारे प्यारे नादान संसदीय वाम का टिपिकल सोशल डेमॉक्रेटिक प्रोग्राम जस का तस सौ फीसदी बचा है और जारी है. उसे हमे और आपको मिलकर ही परास्त और पराजित करना होगा. दहाड़ मार मार कर छाती पीटने वाले संसदीय वाम के ईमानदार साथियों से पूछना चाहिए - क्या अब भी संसदीय वाम के अवसरवाद, सुविधवाद और संशोधनवाद सरीखे कीचड़ से नही निकलेंगें आप? मित्रों! हाथोंं में सोशल डेमॉक्रेटिक कार्यक्रम से लदे-फदे संसदीए वाम का लाल झंडा लिए साथियों से पूछना चाहिए - इसका अहसास हुआ है या अभी और बर्बादियों तथा कुर्बानियों का इंतज़ार व दरकार है ?