Thursday, April 2, 2015



आंकड़े चीख-चीख कर कह रहे है .....

विकास हो रहा पूँजी का,  
विनाश हो रहा मेहनतकशों व आम अवाम का


 पिछले दो दशक से दसियों नहीं सैंकड़ों बार यह कहा गया है, और आज भी कहा जा रहा है, कि पूँजी व उद्योग पक्षीय नीतियाँ इसलिए जरूरी हैं कि इससे विदेशी निवेश आकर्षित होगा और आर्थिक विकास में वृद्धि होगी और फिर इससे रोजगार सृजन में तेजी आएगी जिससे अंतत: आम जनता को फायदा होगा। नवउदारवादी (खुले तौर पर लागू की जा रही पूँजीपक्षीय) आर्थिक नीतियों के सभी किस्‍म के पैरोकार यह कहते पाये जाते हैं कि मजदूर-मेहनतकश वर्ग व आम अवाम अगर आज तात्‍कालिक त्‍याग करेगा अर्थात अगर वह अपने आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक हितों को तात्‍कालिक तौर पर त्‍यागने और इन खुली व नग्‍न पूँजीपक्षीय नीतियों को अपनाने के लिए राज़ी होता है, तो ही उसे भविष्‍य में बेहतर जीवन प्राप्‍त होगा। मीडिया इसे अक्‍सरहाँ ''तीखी दवा'' कहता है जिसे मजदूरों को मन से या जबरन ''देश की भलाई'' के लिए पीना पड़ेगा। आइए, जाँच कर देखें कि क्‍या इस बात में सच्‍चाई है?

1.         पिछले दो दशकों की सच्‍चाई यह है कि आर्थिक विकास ( इकोनॉमिक ग्रोथ) हुआ है लेकिन रोजगारविहीन विकास (जॉबलेस ग्रोथ) हुआ  है अर्थात एक ऐसा विकास जिससे रोजगार या तो पैदा नहीं हुआ या हुआ तो बुरी तरह से असुरक्षित रोजगार पैदा हुआ है जो रोजगार के इनफॉरमल क्षेत्र (कॉन्‍ट्रैक्‍ट लेबर के क्षेत्र)  के नाम से जाना जाता है। जीडीपी शानदार ढंग से बढ़ा, एफडीआई में भी व़ृद्धि देखी गई, फिर भी रोजगार की स्थिति बुरी ही बनी रही ।
2.         रोजगार की बुरी स्थिति का ही परिणाम है कि कृषि में जी‍डीपी का हिस्‍सा अत्‍यंत कम होने और कृषि पर आधारि‍त अधिकांश अबादी, खासकर गरीब और छोटे किसानों, के लिए कृषि के अलाभप्रद हो जाने  के बावजूद कृषि पर रोजगार की निर्भरता काफी अधिक बनी हुई है और मजदूरों की एक बहुत बड़ी आबादी अभी भी कृषि से जुड़ी या बंधी हुई है। रोजगार निर्भरता में कृषि‍ की हिस्‍सेदारी अभी भी 56 प्रतिशत बनी हुई है जिसका अर्थ यह है कि जी‍डीपी ग्रोथ से रोजगार निर्माण नहीं हो रहा है।
3.         1993-94 से 2004-05 तक रोजगार वृद्धि दर इसके पिछले दशक अर्थात 1983-84 के दौरान हासिल रोजगार वृद्धि दर 2.02 प्रतिशत की तुलना में मात्र 1.84 प्रतिशत से बढ़ा, जबकि इसी बीच जीडीपी विकास दर 6.3 प्रतिशत रहा। इसके अगले दशक अर्थात 2004-05 से 2009-10 के बीच जीडीपी वृद्धि दर लगभग 9 प्रतिशत रहा, लेकिन रोजगार वृद्धि दर में कोई अतिरिक्‍त वृद्धि नहीं हुई।
4.         1999-00 से 2004-05 के बीच अर्थव्‍यवस्‍था में कुल रोजगार में वृद्धि 397 मिलियन से 458 मिलियन की हुई, लेकिन संगठित या फॉरमल क्षेत्र में हुई कुल वृद्धि इसमें से मात्र 8.5 मिलियन की ही थी। यही नहीं, यह वृद्धि भी अनियमित किस्‍म की नौकरियों में अर्थात इनफॉरमल चरित्र वाली नौकरियों में हुई। इसके अतिरिक्‍त, फॉरमल क्षेत्र का इनफॉरमलाईजेशन भी हुआ और पहले से बेहतर स्थितियों में काम करने वाले कामगारों की स्थिति बुरी होती गई।
5.         2006 से 2010 तक कुल रोजगार वृद्धि दर मात्र 0.1 प्रतिशत का रहा, जबकि श्रम की उत्‍पादकता में इसी दौरान 34 प्रतिशत की शानदार वृद्धि हुई।
6.         1995-96 से 2000-01 के बीच लगभग 1.1 मिलियन मजदूर नौकरी से निकाले गए।
7.         सैंकड़ों सेज (Special Economic Zones-SEZs) बन कर खड़े हो गए जिन्‍हें पब्लिक यूटिलिटी घोषित कर दिया और जहाँ हड़ताल या किसी भी तरह के संघर्ष पर लगभग पूर्ण पाबंदी होती है। मजदूरों के पास सामुहिक ऐक्‍शन की ताकत के अलावा और कुछ भी नहीं होता है, लेकिन मजदूरों को इन नये क्षेत्रों में इस महत्‍वपूर्ण अधिकार से वंचित कर दिया गया।
8.         सेज के अंदरूनी क्षेत्र व परिसर में बिना अनुमति के आना-जाना असंभव है और इसलिए सेज मजदूरों को संगठित करने का काम भी असंभव हो गया।
9.         सेज को स्‍टेट लेबर डिपार्टमेंट से बाहर रखा गया। यहाँ तक कि स्‍वयं सेज को ही लेबर डिपार्टमेंट बना दिया गया। यानी स्‍टेट लेबर डिपार्टमेंट का काम देखने वाले अब सेज के निजी मालिक या डेवलपर्स हो गए। मजदूरों के मुजरिम को ही न्‍यायकर्ता बना दिया गया।
10.       सेज में रेग्‍युलर रोजगार देने का कोई प्राबधान नहीं है।
11.       ज्‍यादा से ज्‍यादा एफडीआई को आकर्षित करने के लिए ''तुलनात्‍मक लाभ की स्थिति'' निर्मित करने के नाम पर श्रम कानूनों में लगातार ढील दी जा रही है। पूँजीपतियों और कारखाना-मालिकों को स्‍वयं अपने बारे में प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार दिया जा रहा है। श्रम कानूनों के तहत उनके निरीक्षण की पुरानी व्‍यवस्‍था को खत्‍म किया जा रहा है और इस तरह श्रम कानूनों का खुले तौर पर उल्‍लंघन किया जा रहा है। जब भी मजदूर ट्रेड यूनियन अधिकारों या श्रम कानूनों के तहत प्राप्‍त अधिकारों का उपयोग करने की जुर्रत करते हैं, उन्‍हें नृशंसतापूर्ण ढंग से दबाया जाता है।
12.       एक नये तरह की मुहिम, दिल्‍ली-कोलकता और दिल्‍ली-मुंबई कॉरीडोर के इर्द-गिर्द विशाल राष्‍ट्रीय औद्योगिक मैनुफैक्‍चरिंग क्षेत्र स्‍थापि‍त किये जाने की मुहिम, शुरू हुई है। और इसके लिए बड़ी मात्रा में कृषि-भूमि को अधिगृहित करने की योजना बनाई जा रही है। मजेदार बात यह है कि सेज की तरह इन औद्योगिक क्षेत्रों को भी पब्लिक यूटिलिटी घोषित किया जाएगा और इनमें हड़ताल करने और स्‍वतंत्रतापूर्वक ट्रेड यूनियन करार्रवाइयों की छूट नहीं दी जाएगी। ट्रेड यूनियन अधिकारों का मजदूर उपयोग न कर पाएँ, इसके लिए वेतन की एक न्‍यूनतम सीमा तय की जाएगी जिससे कम वेतन पाने वाले मजदूरों को ही यूनियन बनाने या यूनियन की कार्रवाइयों में शामिल होने की छूट दी जाएगी। माना जा रहा है कि अंतिम मसविदे में इन प्रस्‍तावों को हटा दिया गया है, लेकिन स्थिति अभी भी साफ नहीं है।
13.       कुल मजदूरों में से केवल 3 प्रतिशत मजदूर ही फॉरमल व संगठित सेक्‍टर में कार्यरत हैं। केवल इतने मजदूरों को ही बमुश्किल समाजिक सुरक्षा लाभ प्राप्‍त हो रहे हैं। बाकी के 97 प्रतिशत मजदूर इनफॉरमल सेक्‍टर में लगे हैं। इन्‍हें शायद ही कोई समाजिक सुरक्षा लाभ प्राप्‍त होता हो। इन्‍हें जानबूझकर श्रम कानूनों के दायरे से बाहर रखा गया है ताकि इनकी श्रमशक्ति का मनमाने दोहन के रास्‍ते में कोई रूकावट न पैदा हो।
14.       लगभग 836 मिलियन भारतीय आबादी 20 रूपये प्रतिव्‍यक्ति प्रतिदिन की आय पर जीवन यापन कर रही है। अनुसूचित जाति के 88 प्रतिशत, पिछड़ी जातियों के 80 प्रतिशत तथा मुस्लिमों के 84 प्रतिशत लोग गरीब या आर्थिक रूप से कमजोर ग्रुप में हैं। इनफॉरमल क्षेत्र के 79 प्रतिशत लोग भी इसी केटेगरी में आते हैं।
15.       कुल मजदूरों में से मात्र 6.4 प्रतिशत मजदूर ही यूनियनों में संगठित हैं। 173 मिलियन वेतनभोगियों में से 73 मिलियन मजदूरों को न्‍यूनतम वेतन भी प्राप्‍त नही होता है।
16.       उदारीकरण के वर्तमान दौर में भारत में कुल राष्‍ट्रीय आय में पूँजीपतियों के मुनाफे का हिस्‍सा लगातार और भयानक से बढ़ रहा है जबकि मजदूरों को प्राप्‍त होने वाले वेतन का हिस्‍सा लगातार घट रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि मजदूरों की सामुहिक मोल-तोल करने की क्षमता में भारी गिरावट हुई है।
17.       भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में एक नये ढंग के अत्‍यंत ही खतरनाक अंतरराष्‍ट्रीय श्रम विभाजन का जन्‍म भी हुआ है। देखा जा रहा है कि श्रम केंद्रि‍त, स्‍वास्‍थ्‍य के लिए खतरनाक और पर्यावरणीय तौर पर खर्चीले मैनुफैक्‍चरिंग क्रिया-कलापों और अन्‍य तरह के कार्यों को विकासशील देशों, खासकर के एशिया के विकासशील देशों में स्‍थानांतरित किया जा रहा है। इस परिघटना ने विकासशील देशों को प्रदूषण का स्‍वर्ग बना दिया है।
18.       भारत में कुल विदेशी निवेश में ''डर्टी इंडस्‍ट्रीज'' का हिस्‍सा 1991-2000 के दौरान 51 प्रतिशत था। इसका 27.4 प्रतिशत उर्जा में, 4.5 प्रतिशत केमिकल्‍स में, 7.5 प्रतिशत परिवहन में, 5.5 प्रतिशत धातु-निष्‍कर्षन में और 3.5 प्रतिशत खाद्य प्रसंस्करण में है। इनमें से ये सभी लाल रंग से तारांकित हैं अर्थात सबसे अधि‍क प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग हैं।
19.       भारत के 75000 किलोमीटर लंबे समुद्री तटों को पूरे विश्‍व के कुड़े-कचरों के डंपिंग-ग्राउंड में परिवर्तित कर दिया गया है। जले शीशे की राख, जले जस्‍ते की राख, बैटरी स्‍कार्प, गंदे और व्‍यर्थ व अपशिष्‍ट तेल और एसबेस्‍टस से भरे पुराने समुद्री जहाज इन तटों पर बड़ी मात्रा में निपटाए जाते हैं। किसी को भी आश्‍चर्य में डालने वाली बात यह है कि भारत प्रतिवर्ष अपने 7 वृहत और 100 छोटे बंदरगाहों से 70000 मिट्रीक टन जिंक अपशिष्‍ट और लगभग 50000 मिट्रीक टन लीड अपशिष्‍ट का आयात करता है। आस्‍ट्रेलिया, कनाडा, इंगलैंड और अमेरिका से भारी मात्रा में प्‍लास्टिक और धातु के अपश्ष्टि भारत में रिसाइक्लिंग के लिए आयातित होते हैं। यह पूरा सच नहीं, हिमपर्वत का सिरा भर है और सच्‍चाई की और इंगित करने वाली प्रवृति का सूचक मात्र है। पूरी तस्‍वीर सच में भयावह है। भारतीय व्‍यापार में प्रदूषण का अनुपात जो 1985 में 0.480 था 2000 में बढ़कर 1.38 हो चुका है। सिर्फ 2006 से 2009 के तीन वर्षों में स्‍वास्‍थ्‍य के लिए खतरनाक उद्योगों की संख्‍या कई गुना बढ़ गई है और वहीं इनमें कार्यरत मजदूरों की संख्‍या जो 2006 में 324437 थी 2009 में बढ़कर 1949977 हो गई है।
20.       अंतरराष्‍ट्रीय श्रम संगठन के एक अनुमान के मुताबिक भारत में 403000 लोग प्रतिवर्ष कार्य से जुड़े रोगों से मर जाते हैं। प्रतिदिन 1000 से ज्‍यादा मजदूर या 46 मजदूर प्रतिघंटा पेशे से संबंधित रोगों और कार्य के दौरान पर्याप्‍त सुरक्षा के अभाव से जुड़े मामलों के कारण मर जाते हैं। भारत में पेशे से जुड़े रोगों का वर्तमान बोझ 18 मिलियन है।
21.       भारत में जीडीपी का मात्र 3 प्रतिशत सवास्‍थ्‍य सेवाओं और इसके रख-रखाव पर खर्च होता है। इसका 75 प्रतिशत उपचारात्‍मक स्‍वास्‍थ्‍य पर खर्च होता है। पेशे से जुडे बीमारियों पर होने वाला सरकारी खर्च लगभग शून्‍य है।

''सर्वहारा'' ( नई सीरिज न. 3) से  

Tuesday, March 31, 2015

बजट 2015-16 और इससे पैदा हुई निराशा के आगे....


जनता कह रही है विश्‍वासघात हुआ, अच्छे दिनों की दूर-दूर तक कोई उम्‍मीद नहीं 

जिन्‍होंने सच में अच्छे दिनों की उम्मीद में नरेंद्र मोदी का समर्थन किया था, उनके लिए इस बजट ने बड़े मायूसी भरे दिन लाये हैं। इन्‍हें शायद इस बात का अंदाजा नहीं था कि कॉरपोरेट और बड़ी पूँजी के हितों को आगे बढ़ाने की मनमोहन सरकार की नीतियों को ही मोदी सरकार आगे बढ़ाएगी, वह भी दोगुनी गति से। तमाम बुरे संकेतों के बावजूद अब तक वे नरेंद्र मोदी पर असीम श्रद्धा लुटा रहे थे, पूरे के पूरे उनके 'भक्‍त' बन चुके थे और इस ख्‍याली दुनिया में विचरण कर रहे थे कि इधर नरेंद्र मोदी की सरकार बनेगी और उधर समस्‍यायें छूमंतर हो जाएंगी। जो अब तक होश में नहीं आए थे, उन्‍हें इस बजट ने झिंझोड़ कर जगा दिया है।    
जैसा कि उम्‍मीद थी, सरकार बनते ही मोदी का असली स्‍वरूप प्रकट हो गया। अत्‍यंत तीव्र गति से स्‍पष्‍ट हुआ कि जनता बुरी तरह ठगी गई है और मोदी अपने वायदों के बिल्‍कुल विपरीत आचरण कर रहे हैं। आज नौ महीने बीत गए हैं और इस छोटी अवधि में ही नरेंद्र मोदी और भाजपा के झूठ की सारी परतें एक-एक कर के खुल गईं। इसी के साथ जनता की सारी उम्‍मीदें भी धराशायी हो गईं। कालेधन पर भाजपा के नेताओं, सरकार के मंत्रियों और स्‍वयं प्रधानमंत्री बन चुके नरेंद्र मोदी के बोल बदल गए। एफ.डी.आई. के विरोध से सरकार पूरी तरह पलटते हुए इसे हर क्षेत्र में सौ फीसदी लागू करने पर आमादा है। श्रम कानूनों, कारखाना कानूनों और अप्रेंटिस कानूनों को पूँजीपतियों के माकूल बनाने के लिए उन्‍हें पूरी तरह बदल दिया गया। धरती के अंदर छुपी संपदा (खनिजों) को पूँजीपतियों के हाथों सौंपने के लिए पर्यावरण संबंधी कानूनों सहित दर्जनों तरह के अन्‍य कानूनों को बदला या प्रभावित किया गया। स्‍वयं धरती को यानी किसानों की जमीनों को छीन कर कॉरपोरेट और बड़े पूँजीपतियों को सौंपने के लिए अ्ंग्रेजों के जमीन अधिग्रहण कानून से भी ज्‍यादा खतरनाक जमीन अधिग्रहण अध्‍यादेश देश पर थोप दिया गया है और मोदी स्‍वयं इसे संसद के दाेनों सदनों से पास कराने के लिए एड़ी-चोटी को पसीना एक कर रहे हैं। न्‍यूक्लियर डील और इससे जुड़े ''लायबलिटी बिल'' के मामले में अमरीका के समक्ष पूरी तरह घुटने टेक दिए गए। और अब रेल बजट तथा आम बजट के जरिए एक बार फिर से आम जनता के हितों पर निर्ममता से हमला करते हुए कॉरपोरेट घरानों और बड़े पूँजीपतियों के हितों और जरूरतों की खुल कर तरफदारी की गई है। 
आम बजट के पहले इस सरकार ने आम जनता की आँखों में धूल झोंकते हुए बड़ी निर्लज्‍जता से उस वक्‍त डीजल के दाम पर से सरकारी नियंत्रण हटा दिया जब अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में कच्‍चे तेल का दाम गोता लगा रहा था। आम लोगों को लगा कि मोदी के इस फैसले से डीजल के दाम गिरे, जबकि डीजल के दाम के गिरने के कारण और उसके पीछे की सच्‍चाई बिल्‍कुल ही अलग और भिन्‍न है और जल्‍द ही इसका भयानक कुप्रभाव दिखेगा।    
''चरवाहे से नाराज भेड़ों ने एक भेड़िये को अपना नेता चुन लिया'' - जर्मनी के सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी कवि ब्रतोल्‍त ब्रेख्‍त ने हिटलर की जीत पर बड़े मार्मिक ढंग से यह टिप्‍पणी की थी। नरेंद्र मोदी को समर्थन देने और चुनने के मामले में भारत के आम अवाम की हालत भी इन मासूम भेड़ों की तरह हो गई है। वोट देते वक्‍त लोगों के दिलों की हसरत कुछ और थी और हुआ कुछ और। लोगों की उम्‍मीदों के अनुसार बैलेट बॅाक्‍स से ''जनता के सेवक और चौकीदार'' को बाहर आना था, लेकिन निकला एक ऐसा चालाक जिन्‍न जो दिखावा तो जनता के सेवक होने का करता है लेकिन असल में सेवा बड़े पूँजीपतियों की करता है। इसकी एक मिसाल यह है कि यह सेवक आम जनता को बिना सब्सिडी के जीने की आदत अपनाने की सलाह देता है, लेकिन कॉरपोरेट घरानों को लाखों-करोड़ों में सब्सिडी देता है, उनके लिए सारी सरकारी सुविधा मुहैया कराता है, करों में छूट देता है और जरूरत पड़ने पर उनके घाटे को स्‍वयं अपने ऊपर लेकर जनता के खजाने से उन्‍हें पूरा करने का आश्‍वासन देता है।  
दरअसल यूपीए की मनमोहन सरकार जिस तरह से एक तरफ भ्रष्‍टाचार, घोटाले और महँगाई से आम जनता की कचूमर निकालने पर आमादा थी, और दूसरी तरफ देश के अमूल्‍य संसाधनों को देशी तथा विदेशी पूँजीपतियों के हाथों लुटा रही थी, वैसे में कांग्रेस और इसकी सहयोगी पार्टियों की यूपीए सरकार को उखाड़ फेंकना आम जनता की पहली प्राथमिकता बन गई थी। तात्‍कालिक तौर पर इसके सिवा और कोई दूसरा रास्‍ता मौजूद नहीं था कि आम जनता भाजपा और खासकर मोदी के वायदों में विश्‍वास व्‍यक्‍त करे और भरपूर वोट से उसे सत्‍ता में ले आए, ताकि यूपीए के घोर कुशासन से मुक्ति मिले। लेकिन, जैसा कि हम इस बजट के माध्‍यम से देख पा रहे हैं, आम जनता को यूपीए के बदले नरेंद्र मोदी की सरकार के रूप में एक ऐसा विकल्‍प मिला जो यूपीए से भी अधिक पूँजीपक्षीय और कॉरपोरेट फ्रेंडली है, और जो यूपीए की घोर पूँजीपक्षीय और कॉरपोरेट फ्रेंडली विकास की नीतियों को ही जेट विमान की गति से लागू करने पर अड़ी हुई है। बाजार और महँगाई का कहर घटने के बजाए बढ़ा है, भले ही मोदी सरकार के आँकड़ों में यह घटा हुआ दिखता है। खनिजों और संसाधनों को पहले से अधिक गति से पूँजी के मठाधीशों और मगरमच्‍छों को सौंपने की कार्रवाई चल रही है। इसके साथ-साथ अब मोदी सरकार के भगवा संगी-साथियों की मंडली बिना किसी डर के देश में साम्‍प्रदायिकता की आग सुलगाने में लगी है। स्‍वयं केंद्रीय सरकार मानव संसाधन मंत्री के माध्‍यम से देश के इतिहास का भगवाकरण करने की नीति पर चल रही है। जनता ठगे व्‍यक्ति की तरह टुकुर-टुकुर मुँह देख रही है और सोच रही है कि क्‍या इसी दिन के लिए मोदी सरकार को लाया था। आम जनता के लिए सबसे बड़े दुख का कारण शायद यह है कि अब वह इस मोदी सरकार को उसके किए वायदों को पूरा करने के लिए किसी भी प्रकार से विवश नहीं कर सकती है। और इन पाँच सालों में सरकार खुल कर जनता के नाम पर पूँजी की सेवा करती रहेगी। अगले सालों में फिर से नये वायदे होंगे, कोई और नया या पुराना मदारी आएगा और करतब दिखाकर वोट लेगा और चला जाएगा ...और जनता इसी तरह से एक बार फिर, एक बार फिर ... और एक बार फिर .. ठगी जाएगी। 19 47 से यही तो हो रहा है। अब जनता के लिए इस दिखाबटी जनतंत्र के प्रति ठोस सबक लेने का वक्‍त आ पहुँचा है।       ऐसे ''जनतांत्रिक ठगी'' के बारे में आज गंभीरता से सोंचने का वक्‍त है। दरअसल, मोदी सरकार का जबर्दस्‍त विश्‍वासघात स्‍वयं जनता को बड़े जबर्दस्‍त ढंग से शिक्षित कर रहा है। इस अर्थ में मोदी सरकार और मोदी स्‍वयं बदलाव की राजनीति की और इसलिए स्‍वयं इतिहास की बड़ी सेवा कर रहे हैं, खासकर यह बताकर कि इस पूँजीवादी जनतंत्र और संसदीय पद्धति की सीमा क्‍या है; यह स्‍पष्‍ट कर के कि पूँजीपतियों और आम जनता दोनों की समान रूप से सेवा यह जनतंत्र नहीं कर सकता है सरकार की ड्राइविंग सीट पर चाहे छप्‍पन इंच सीना वाला बैठा हो या आठ इंच वाला, जनता से वह चाहे जो भी वायदा कर के आया हो और उसके झंडे और डंडे का रंग चाहे जो भी हो। पाँच साल में एक बार वोट देने के बाद जनता के हाथ में कुछ भी नहीं रह जाता है। जनता को इस तरह के जनतंत्र में बस इतना ही अधिकार होता है कि वह लूटेरों के भिन्‍न-भिन्‍न गिरोहों में से वह किसी एक को चुने और अगले पाँच सालों तक अपने ऊपर शोषण व शासन करने और स्‍वयं को उसके माध्‍यम से पूँजीपतियों द्वारा लुटे जाने की इजाजत दे। 
आज जब जनता को यह अहसास हो रहा है कि नरेंद्र मोदी की असलियत क्‍या है, तब भी जनता की मुक्ति का रास्‍ता एकमात्र तभी प्रकट होगा जब वह यह भी समझे कि उसकी समस्‍याओं की जड़ में वास्‍तव में क्‍या है जिसे हटाए और नष्‍ट किए बिना महज सत्‍ता की कुर्सी हथियाने वाली पार्टियों और तख्‍तोताज पर बैठे नेताओं को बदलते रहने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। समस्‍या की जड़ में स्‍वयं यह संसदीय पद्धति है जिसकी आड़ में असल में पूँजीपति वर्ग की तानाशाही चल रही है। उसके हितों को आगे बढ़ाने में न सिर्फ संसदीय पार्टियाँ लगी हुई है, अपितु अफसरशाही और पूँजीवादी मीडिया का पूरा का पूरा तंत्र लगा हुआ है। यहाँ तक कि न्‍यायालय और फौज, जिनके ऊपर जनता का आज भी अपार भरोसा है, का इस्‍तेमाल भी पूँजीपति वर्ग बखूबी अपने पक्ष में करता रहा है। इस पूरे पूँजीवादी कुचक्र को ध्‍वस्‍त किए बिना और आम जनता के गले के चारो तरफ पड़े संपूर्ण फंदे को तोड़े बिना आम जनता के अच्‍छे दिनों की बात करना और उसके बारे में उम्‍मीद बाँधना गलत होगा। असंभव तो यह है ही। जाहिर है जनता की क्रांतिकारी कार्रवाई ही इस तरह के परिवर्तन कर सकती है और संसदीय पद्धति नहीं, जनता की कार्यकारी संसद ही इसके बाद पूँजीपति वर्ग की तानाशाही को उखाड़ फेंक सकती है और उसके प्रतिरोधों पर पूणत: अंकुश लगा सकती है।
मोदी सरकार के विश्‍वासघात प्रकरण से आम जनता अगर यह सबक नहीं लेती है तो फिर से उसे धोखे खाने के लिए तैयार रहना चाहिए। और तैयार रहना पड़ेगा। मनमोहन सिंह की विगत सरकार और आज की मोदी सरकार दोनों के बारे में आसानी से यह कहा जा सकता है कि वह जनता की सरकार कम पूँजीपति वर्ग की कार्यकारी परिषद ज्‍यादा दिखाई देती है। यह इस बात का प्रमाण है कि बुर्जुआ वर्ग की सेवा करने वाली और स्‍वयं बुर्जुआ (पूँजीपित) वर्ग द्वारा इतिहास में पैदा की गई संसदीय पद्धति भारत में काफी परिपक्‍व हो चुकी है। एक हद तक यह इस बात का भी प्रमाण है कि देश का पूँजीपति वर्ग अभी किसी आशातीत क्रांतिकारी संकट में फँसा हुआ नहीं है और इसीलिए बुर्जुआ पार्टियाँ धड़ल्‍ले से और बिना किसी अधिक भय के जनता से विश्‍वासघात कर रही हैं।     
यहाँ तक कि गरीब-मेहनतकश वर्ग भी मोदी से बड़ी उम्मीदें कर बैठा था। यह पूँजीवादी व्‍यवस्‍था का विकल्‍प खड़ा करने अर्थात पूँजीवादी जनतंत्र से पूरी तरह भिन्‍न एक सच्‍चे जनवादी और समाजवादी विकल्‍प खड़ा करने के रास्‍ते में एक बड़ी बाधा की सूचक है। यहाँ पर यह कहना आवश्‍यक है कि जब तक आम अवाम खासकर मेहनतकश वर्ग या उसका बड़ा हिस्‍सा स्‍वयं अपने अनुभवों और क्रांतिकारी राजनीतिक कार्रवाइयों से यह नहीं समझ लेता है कि संसदीय जनतंत्र के परदे के पीछे पूँजी की तानाशाही काम करती है और कर रही है तथा संसदीय पार्टियाँ और इसके नेता चाहे जो लफ्फाजी कर लें, वे महज पूँजी अर्थात पूँजीपतियों के मुलाजिम से अधिक कुछ नहीं हैं, तब तक उनकी मुक्ति का रास्‍ता कतई नहीं खुलता होता है। तब तक उम्मीदों की कोई नई खिड़की नहीं खुलेगी। और इसीलिए उनके अच्‍छे दिन आने का भी कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता है।       
आम जनता की सबसे बड़ी और सबसे तात्कालिक जरूरत यह थी कि महँगाई पर रोक लगे, लेकिन मोदी सरकार ने इसके विपरीत महँगाई बढ़ाने का काम किया। रेल बजट को लें। रेल से जिंसों की ढुलाई की दर बढ़ाकर महँगाई के नये पर लगा दिए, जबकि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में कच्‍चे तेल की कीमतों में हुई भारी गिरावट के कारण मालभाड़े में और कमी किए जाने की वाजिब माँग उठ रही थी। रेल बजट में भले ही यात्री किराया नहीं बढ़ाया गया है, लेकिन बावजूद इसके हमारी जेबें हल्की होंगी। ऐसा हुआ है रेल बजट में मालभाड़े में बढ़ोतरी के प्रस्ताव से। विभिन्न जिंसों के लिए मालभाड़े में 10 पर्सेंट तक बढ़ोतरी के प्रस्ताव से खाद्यान्न, दालें, सीमेंट और इस्पात जैसी जरूरी चीजों के दाम बढ़ेंगे। ज्ञातव्य है कि रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने गुरुवार को संसद में पेश 2015-16 के रेल बजट में 12 जिंसों के भाड़े में 0-8 से 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी का प्रस्ताव किया है। इसके अलावा यूरिया पर मालभाड़े में 10 प्रतिशत बढ़ोतरी के प्रस्ताव से यूरिया दस दाम बढ़ेंगे इसके पूरे आसार हैं। भारतीय उर्वरक संघ (एफ.ए.आई) के महानिदेशक सतीश चंदर ने कहा है- 'मालभाड़े में बढ़ोतरी से यूरिया के लिए सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी में 300 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी होगी। अभी सरकार यूरिया पर तीन हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी देती है।' सीमेंट पर मालभाड़े में 2.7 पर्सेंट बढ़ोतरी का प्रस्ताव किया गया है। इसी तरह कोयले की ढुलाई पर भाड़े में 6.3 पर्सेंट, लौह एवं इस्पात पर 0.8 पर्सेंट, अनाज व दालों पर 10 पर्सेंट, मूंगफली तेल पर 2.1 पर्सेंट, एलपीजी पर 0.8 पर्सेंट व केरोसीन पर मालभाड़े में 0.8 पर्सेंट वृद्धि का प्रस्ताव किया गया है। लमिया भारत सीमेंट समूह के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मोहिंद्र सिंगी ने कहा है- 'हमारी उत्पादन की लागत 50 किलो के सीमेंट के बैग पर दो से चार रुपये बढ़ेगी।'
उसके एक दिन बाद ही अर्थात 28 फरबरी को लोकसभा में पेश आम बजट में वित्‍त मंत्री ने सेवा करों में 2 प्रतिशत की वृद्धि प्रस्‍तावित कर के लगभग सभी जरूरी सेवाओं के दाम बढ़ाने के संकेत दिए हैं। वहीं दूसरी तरफ कॉरपोरेट टैक्‍स में आगामी चार सालों में 5 प्रतिशत की कमी करने का एलान किया गया। इसके अतिरिक्‍त उन पर पहले से लगने वाले संपत्ति कर (वेल्‍थ टैक्‍स) को खत्‍म कर दिया गया है।      
 चंद महीने पहले की बातें याद कीजिए। पूँजीवादी मीडिया के मोदीमय चमत्कारी प्रचार ने कुछ ऐसा जादुई समां बांधा था कि लोगों ने यह भी देखने और समझने से इनकार कर दिया कि आखिर ऐसे महँगे प्रचार पर हो रहे अरबों के खर्च कौन और क्यों कर रहा है। यह इस बात का भी प्रमाण है कि राजनीतिक रूप से अप्रशिक्षित गरीब अवाम को झूठे वायदों, पूँजीवादी लटकों-झटकों और लज़ीज़ भाषणों के जरिए बहलाना-फुसलाना और उनसे उनके वोट झटक लेना कितना आसान होता है। यह वर्तमान 'जनतंत्र' की उस सीमा को भी दर्शाता है जो गरीबों और मेहनतकशों द्वारा इसके उपभोग किये जाने को लगातार बढ़ते पैमाने पर सीमित करती है। यह सीमा लगातार खींची जा रही है जो इस बात को सुनिश्चित करती है कि वर्तमान जनतंत्र में जनता के हाथ में कुछ भी नहीं रहे। वह कुछ भी तय न करे, यहाँ तक कि वोट देते वक्त भी उसके दिमाग में वे ही बातें हों जिन्हें पूँजीवादी मदारी अपने आकर्षक प्रचार के जरिए उसके दिमाग में ठुंसता है। पूँजी की प्रत्येक बढ़त के साथ जनतंत्र और भी बहुत तेजी से 'जन' से दूर होती जा रही है। यह सब दिखाता है कि ऐसे जनतांत्रिक राज्य में, जिसमें पूँजी बादशाह के पद पर आसीन होती है और पूँजी की ताकत सर्वोपरि हो जाती है, वैसे जनतंत्रों में पैसे के बल पर कोई भी सिद्धस्त बहुरुपिया बाज़ी मार ले जा सकता है. नरेन्द्र मोदी का उदय इस बात का पुख्‍ता और जीता-जागता प्रमाण है। इससे उपरोक्‍त जरूरी सबक लेकर आम अवाम को सरकारें नहीं व्‍यवस्‍था परिवर्ततन की लड़ाई में उतरने की ‍शीघ्र तैयारी करनी चाहिए।   ''सर्वहारा'' (New Series NO. 3)

Thursday, March 26, 2015



''शहीद भगत सिंह विचार पुनरूत्‍थान छात्र-युवा मंच'' द्वारा पटना में शहादत दिवस 23 मार्च 2015 के अवसर पर पटना में भव्‍य रैली व कन्‍वेंशन का सफल आयोजन संपन्‍न हुआ 


23 मार्च 2015 के दिन भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव के शहादत दिवस के अवसर पर सुबह 11 बजे सेे रेलवे स्‍टेशन के पास स्थित बुद्धा पार्क से लगभग 500 छात्र-युवाओं की एक सशक्‍त ''शहीद भगत सिंह विचार पुनरूत्‍थान रैली'' गगनभेदी नारों के साथ निकली जो फ्रेजर रोड, गॉंध्‍ाी मैदान बिस्‍कोमान भवन और गॉंधी संग्रहालय तथा मगध महिला कॉलेज होते हुए गॉंध्‍ाी मैदान के उत्‍तर-पूरब कोने पर स्थित शहीद भगत सिंह चौक तक गई जहॉं पहुँचकर भगत सिंह की मूर्ति पर पुष्‍पार्पण आदि करने के बाद एक छोटी सभा में बदल गई जिसे संबोधित करने वालों में मुख्‍य रूप से न्‍यू ऐज यूथ ऐसो‍सिएशन के साथी राधे श्‍याम, पी.डी.वाई.एफ.(बंगाल) के साथी चिंता बाध्‍यकर तथा आई.एफ.टी.यू. (सर्वहारा) के साथी कान्‍हाई थे। इस सभा का संचालन सर्वहारा जन मोर्चा के साथी अजय कुमार सिन्‍हा ने की।



 तत्‍पश्‍चात रैली पुन: अपनी पुरानी शक्‍ल में आते हुए आई.एम.ए. हॉल के लिए रवाना हो गई जहां 12.30 बजे अपराहन से लेकर शाम 6.45 तक कंवेंशन की कार्यवाही चली। इस रैली में पटना और बंगाल के साथी मुख्‍य रूप से शामिल थे लेकिन इनके अतिरिक्‍त पंजाब से लोकपक्ष के साथी राज मेहता, साथी राकेश वर्मा (जो गंभीर रूप से बीमार होने के कारण पटना आकर भी रैली में शामिल नहीं हो सके) तथा विक्‍की मल्‍होटिया, दिल्‍ली से लोकपक्ष के साथी दामोदर और साथी मनोभंजन तथा उत्‍तरप्रदेश से साथी वीरेश आनंद ने हिस्‍सा लिया। कन्‍वेंशन में पटना के क्रांतिकारी जमात के साथियों में मुख्‍य रूप से सीपीआई(एमएल) के नेता कॉ. अरबिंद सिन्‍हा, कॉ. नंदकिशोर सिंह, श्रम मुक्ति संगठन के नेता कॉ. जयप्रकाश तथा मनोज कुमार झा, भारत जन पहल के नेता कॉ. बलदेव झा, सीसीएसएस के नेता कॉ. नरेंद्र कुमार, कम्‍युनिस्‍ट चेतना मंच के नेता कॉ. विजय बहादुर सिंह और रास बिहारी चौधरी, गणमान्‍य अतिथियों में मनोज कुमार झा और जितेंद्र कुमार सिंह ने कन्‍वेंशन में अपनी उपस्थिति दर्ज की तथा इनमें से अधिकांश ने कन्‍वेंशन में प्रस्‍तुत प्रपत्र के विषय ''वर्तमान दौर और शहीदे आजम भगत सिंह की क्रांतिकारी विरासत'' पर हुई परिचर्चा और बहस में अपने विचार भी रखे। 















कन्‍वेंशन में क्रांतिकारी गीतों की प्रस्‍तुति भी कुछ अंतरालों पर लगातार होती रही। सिनियर साथियों व नेताओं के अतिरिक्‍त छात्रों व युवाओं के तरफ से भी काफी तादाद में वक्‍तव्‍य रखे गए जिनमें प्रमुख नाम हैं 'नया' के साथी आशीष, प्रसन्‍ना, अर्जुन, रंजीत, राधेश्‍याम तथा नारायण दत्‍त तथा पीडीवाईएफ के साथी कौशिक बर्णवाल, चिंता बाध्‍यकर तथा पंजाब लोकपक्ष के साथी विक्‍की मल्‍होटिया, दिल्‍ली लोकपक्ष के तरफ से कॉ. दामोदर और मनोभंजन आदि शामिल थे। क्रांतिकारी गीत प्रस्‍तुत करने वालों में मुख्‍य थे पटना के नया के साथी रानी, नीलेश ग्रुप ( निलेश, दिल बहादूर आदि) तथा गया के 'नया' के साथी मुकेश विद्यार्थी आदि। कन्‍वेंशन का संचालन राधेश्‍याम, विक्‍की मल्‍होटिया, चिंता बाध्‍यकर, रंजीत और नारायण दत्‍त ने संयुक्‍त रूप से किया तथा इसकी अध्‍यक्षता कॉ. दामोदर, कॉ. मनोभंजन, कॉ. कौशिक, कॉ. रानी और कॉ. अर्जुन ने संयुक्‍त रूप से किया। कन्‍वेंशन में प्रपत्र कॉ. नारायण दत्‍त ने पेश किया। कंवेंशन की विधिवत शुरूआत शहीद भगत सिंह की तस्‍वीर पर माल्‍यार्पण व पुष्‍पार्पण और फिर पूरी दुनिया में अब तक क्रांति व जन संघर्षों में शहीद हुए साथियों के लिए दो मिनट का मौन रख कर की गई।