Tuesday, March 31, 2015

बजट 2015-16 और इससे पैदा हुई निराशा के आगे....


जनता कह रही है विश्‍वासघात हुआ, अच्छे दिनों की दूर-दूर तक कोई उम्‍मीद नहीं 

जिन्‍होंने सच में अच्छे दिनों की उम्मीद में नरेंद्र मोदी का समर्थन किया था, उनके लिए इस बजट ने बड़े मायूसी भरे दिन लाये हैं। इन्‍हें शायद इस बात का अंदाजा नहीं था कि कॉरपोरेट और बड़ी पूँजी के हितों को आगे बढ़ाने की मनमोहन सरकार की नीतियों को ही मोदी सरकार आगे बढ़ाएगी, वह भी दोगुनी गति से। तमाम बुरे संकेतों के बावजूद अब तक वे नरेंद्र मोदी पर असीम श्रद्धा लुटा रहे थे, पूरे के पूरे उनके 'भक्‍त' बन चुके थे और इस ख्‍याली दुनिया में विचरण कर रहे थे कि इधर नरेंद्र मोदी की सरकार बनेगी और उधर समस्‍यायें छूमंतर हो जाएंगी। जो अब तक होश में नहीं आए थे, उन्‍हें इस बजट ने झिंझोड़ कर जगा दिया है।    
जैसा कि उम्‍मीद थी, सरकार बनते ही मोदी का असली स्‍वरूप प्रकट हो गया। अत्‍यंत तीव्र गति से स्‍पष्‍ट हुआ कि जनता बुरी तरह ठगी गई है और मोदी अपने वायदों के बिल्‍कुल विपरीत आचरण कर रहे हैं। आज नौ महीने बीत गए हैं और इस छोटी अवधि में ही नरेंद्र मोदी और भाजपा के झूठ की सारी परतें एक-एक कर के खुल गईं। इसी के साथ जनता की सारी उम्‍मीदें भी धराशायी हो गईं। कालेधन पर भाजपा के नेताओं, सरकार के मंत्रियों और स्‍वयं प्रधानमंत्री बन चुके नरेंद्र मोदी के बोल बदल गए। एफ.डी.आई. के विरोध से सरकार पूरी तरह पलटते हुए इसे हर क्षेत्र में सौ फीसदी लागू करने पर आमादा है। श्रम कानूनों, कारखाना कानूनों और अप्रेंटिस कानूनों को पूँजीपतियों के माकूल बनाने के लिए उन्‍हें पूरी तरह बदल दिया गया। धरती के अंदर छुपी संपदा (खनिजों) को पूँजीपतियों के हाथों सौंपने के लिए पर्यावरण संबंधी कानूनों सहित दर्जनों तरह के अन्‍य कानूनों को बदला या प्रभावित किया गया। स्‍वयं धरती को यानी किसानों की जमीनों को छीन कर कॉरपोरेट और बड़े पूँजीपतियों को सौंपने के लिए अ्ंग्रेजों के जमीन अधिग्रहण कानून से भी ज्‍यादा खतरनाक जमीन अधिग्रहण अध्‍यादेश देश पर थोप दिया गया है और मोदी स्‍वयं इसे संसद के दाेनों सदनों से पास कराने के लिए एड़ी-चोटी को पसीना एक कर रहे हैं। न्‍यूक्लियर डील और इससे जुड़े ''लायबलिटी बिल'' के मामले में अमरीका के समक्ष पूरी तरह घुटने टेक दिए गए। और अब रेल बजट तथा आम बजट के जरिए एक बार फिर से आम जनता के हितों पर निर्ममता से हमला करते हुए कॉरपोरेट घरानों और बड़े पूँजीपतियों के हितों और जरूरतों की खुल कर तरफदारी की गई है। 
आम बजट के पहले इस सरकार ने आम जनता की आँखों में धूल झोंकते हुए बड़ी निर्लज्‍जता से उस वक्‍त डीजल के दाम पर से सरकारी नियंत्रण हटा दिया जब अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में कच्‍चे तेल का दाम गोता लगा रहा था। आम लोगों को लगा कि मोदी के इस फैसले से डीजल के दाम गिरे, जबकि डीजल के दाम के गिरने के कारण और उसके पीछे की सच्‍चाई बिल्‍कुल ही अलग और भिन्‍न है और जल्‍द ही इसका भयानक कुप्रभाव दिखेगा।    
''चरवाहे से नाराज भेड़ों ने एक भेड़िये को अपना नेता चुन लिया'' - जर्मनी के सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी कवि ब्रतोल्‍त ब्रेख्‍त ने हिटलर की जीत पर बड़े मार्मिक ढंग से यह टिप्‍पणी की थी। नरेंद्र मोदी को समर्थन देने और चुनने के मामले में भारत के आम अवाम की हालत भी इन मासूम भेड़ों की तरह हो गई है। वोट देते वक्‍त लोगों के दिलों की हसरत कुछ और थी और हुआ कुछ और। लोगों की उम्‍मीदों के अनुसार बैलेट बॅाक्‍स से ''जनता के सेवक और चौकीदार'' को बाहर आना था, लेकिन निकला एक ऐसा चालाक जिन्‍न जो दिखावा तो जनता के सेवक होने का करता है लेकिन असल में सेवा बड़े पूँजीपतियों की करता है। इसकी एक मिसाल यह है कि यह सेवक आम जनता को बिना सब्सिडी के जीने की आदत अपनाने की सलाह देता है, लेकिन कॉरपोरेट घरानों को लाखों-करोड़ों में सब्सिडी देता है, उनके लिए सारी सरकारी सुविधा मुहैया कराता है, करों में छूट देता है और जरूरत पड़ने पर उनके घाटे को स्‍वयं अपने ऊपर लेकर जनता के खजाने से उन्‍हें पूरा करने का आश्‍वासन देता है।  
दरअसल यूपीए की मनमोहन सरकार जिस तरह से एक तरफ भ्रष्‍टाचार, घोटाले और महँगाई से आम जनता की कचूमर निकालने पर आमादा थी, और दूसरी तरफ देश के अमूल्‍य संसाधनों को देशी तथा विदेशी पूँजीपतियों के हाथों लुटा रही थी, वैसे में कांग्रेस और इसकी सहयोगी पार्टियों की यूपीए सरकार को उखाड़ फेंकना आम जनता की पहली प्राथमिकता बन गई थी। तात्‍कालिक तौर पर इसके सिवा और कोई दूसरा रास्‍ता मौजूद नहीं था कि आम जनता भाजपा और खासकर मोदी के वायदों में विश्‍वास व्‍यक्‍त करे और भरपूर वोट से उसे सत्‍ता में ले आए, ताकि यूपीए के घोर कुशासन से मुक्ति मिले। लेकिन, जैसा कि हम इस बजट के माध्‍यम से देख पा रहे हैं, आम जनता को यूपीए के बदले नरेंद्र मोदी की सरकार के रूप में एक ऐसा विकल्‍प मिला जो यूपीए से भी अधिक पूँजीपक्षीय और कॉरपोरेट फ्रेंडली है, और जो यूपीए की घोर पूँजीपक्षीय और कॉरपोरेट फ्रेंडली विकास की नीतियों को ही जेट विमान की गति से लागू करने पर अड़ी हुई है। बाजार और महँगाई का कहर घटने के बजाए बढ़ा है, भले ही मोदी सरकार के आँकड़ों में यह घटा हुआ दिखता है। खनिजों और संसाधनों को पहले से अधिक गति से पूँजी के मठाधीशों और मगरमच्‍छों को सौंपने की कार्रवाई चल रही है। इसके साथ-साथ अब मोदी सरकार के भगवा संगी-साथियों की मंडली बिना किसी डर के देश में साम्‍प्रदायिकता की आग सुलगाने में लगी है। स्‍वयं केंद्रीय सरकार मानव संसाधन मंत्री के माध्‍यम से देश के इतिहास का भगवाकरण करने की नीति पर चल रही है। जनता ठगे व्‍यक्ति की तरह टुकुर-टुकुर मुँह देख रही है और सोच रही है कि क्‍या इसी दिन के लिए मोदी सरकार को लाया था। आम जनता के लिए सबसे बड़े दुख का कारण शायद यह है कि अब वह इस मोदी सरकार को उसके किए वायदों को पूरा करने के लिए किसी भी प्रकार से विवश नहीं कर सकती है। और इन पाँच सालों में सरकार खुल कर जनता के नाम पर पूँजी की सेवा करती रहेगी। अगले सालों में फिर से नये वायदे होंगे, कोई और नया या पुराना मदारी आएगा और करतब दिखाकर वोट लेगा और चला जाएगा ...और जनता इसी तरह से एक बार फिर, एक बार फिर ... और एक बार फिर .. ठगी जाएगी। 19 47 से यही तो हो रहा है। अब जनता के लिए इस दिखाबटी जनतंत्र के प्रति ठोस सबक लेने का वक्‍त आ पहुँचा है।       ऐसे ''जनतांत्रिक ठगी'' के बारे में आज गंभीरता से सोंचने का वक्‍त है। दरअसल, मोदी सरकार का जबर्दस्‍त विश्‍वासघात स्‍वयं जनता को बड़े जबर्दस्‍त ढंग से शिक्षित कर रहा है। इस अर्थ में मोदी सरकार और मोदी स्‍वयं बदलाव की राजनीति की और इसलिए स्‍वयं इतिहास की बड़ी सेवा कर रहे हैं, खासकर यह बताकर कि इस पूँजीवादी जनतंत्र और संसदीय पद्धति की सीमा क्‍या है; यह स्‍पष्‍ट कर के कि पूँजीपतियों और आम जनता दोनों की समान रूप से सेवा यह जनतंत्र नहीं कर सकता है सरकार की ड्राइविंग सीट पर चाहे छप्‍पन इंच सीना वाला बैठा हो या आठ इंच वाला, जनता से वह चाहे जो भी वायदा कर के आया हो और उसके झंडे और डंडे का रंग चाहे जो भी हो। पाँच साल में एक बार वोट देने के बाद जनता के हाथ में कुछ भी नहीं रह जाता है। जनता को इस तरह के जनतंत्र में बस इतना ही अधिकार होता है कि वह लूटेरों के भिन्‍न-भिन्‍न गिरोहों में से वह किसी एक को चुने और अगले पाँच सालों तक अपने ऊपर शोषण व शासन करने और स्‍वयं को उसके माध्‍यम से पूँजीपतियों द्वारा लुटे जाने की इजाजत दे। 
आज जब जनता को यह अहसास हो रहा है कि नरेंद्र मोदी की असलियत क्‍या है, तब भी जनता की मुक्ति का रास्‍ता एकमात्र तभी प्रकट होगा जब वह यह भी समझे कि उसकी समस्‍याओं की जड़ में वास्‍तव में क्‍या है जिसे हटाए और नष्‍ट किए बिना महज सत्‍ता की कुर्सी हथियाने वाली पार्टियों और तख्‍तोताज पर बैठे नेताओं को बदलते रहने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। समस्‍या की जड़ में स्‍वयं यह संसदीय पद्धति है जिसकी आड़ में असल में पूँजीपति वर्ग की तानाशाही चल रही है। उसके हितों को आगे बढ़ाने में न सिर्फ संसदीय पार्टियाँ लगी हुई है, अपितु अफसरशाही और पूँजीवादी मीडिया का पूरा का पूरा तंत्र लगा हुआ है। यहाँ तक कि न्‍यायालय और फौज, जिनके ऊपर जनता का आज भी अपार भरोसा है, का इस्‍तेमाल भी पूँजीपति वर्ग बखूबी अपने पक्ष में करता रहा है। इस पूरे पूँजीवादी कुचक्र को ध्‍वस्‍त किए बिना और आम जनता के गले के चारो तरफ पड़े संपूर्ण फंदे को तोड़े बिना आम जनता के अच्‍छे दिनों की बात करना और उसके बारे में उम्‍मीद बाँधना गलत होगा। असंभव तो यह है ही। जाहिर है जनता की क्रांतिकारी कार्रवाई ही इस तरह के परिवर्तन कर सकती है और संसदीय पद्धति नहीं, जनता की कार्यकारी संसद ही इसके बाद पूँजीपति वर्ग की तानाशाही को उखाड़ फेंक सकती है और उसके प्रतिरोधों पर पूणत: अंकुश लगा सकती है।
मोदी सरकार के विश्‍वासघात प्रकरण से आम जनता अगर यह सबक नहीं लेती है तो फिर से उसे धोखे खाने के लिए तैयार रहना चाहिए। और तैयार रहना पड़ेगा। मनमोहन सिंह की विगत सरकार और आज की मोदी सरकार दोनों के बारे में आसानी से यह कहा जा सकता है कि वह जनता की सरकार कम पूँजीपति वर्ग की कार्यकारी परिषद ज्‍यादा दिखाई देती है। यह इस बात का प्रमाण है कि बुर्जुआ वर्ग की सेवा करने वाली और स्‍वयं बुर्जुआ (पूँजीपित) वर्ग द्वारा इतिहास में पैदा की गई संसदीय पद्धति भारत में काफी परिपक्‍व हो चुकी है। एक हद तक यह इस बात का भी प्रमाण है कि देश का पूँजीपति वर्ग अभी किसी आशातीत क्रांतिकारी संकट में फँसा हुआ नहीं है और इसीलिए बुर्जुआ पार्टियाँ धड़ल्‍ले से और बिना किसी अधिक भय के जनता से विश्‍वासघात कर रही हैं।     
यहाँ तक कि गरीब-मेहनतकश वर्ग भी मोदी से बड़ी उम्मीदें कर बैठा था। यह पूँजीवादी व्‍यवस्‍था का विकल्‍प खड़ा करने अर्थात पूँजीवादी जनतंत्र से पूरी तरह भिन्‍न एक सच्‍चे जनवादी और समाजवादी विकल्‍प खड़ा करने के रास्‍ते में एक बड़ी बाधा की सूचक है। यहाँ पर यह कहना आवश्‍यक है कि जब तक आम अवाम खासकर मेहनतकश वर्ग या उसका बड़ा हिस्‍सा स्‍वयं अपने अनुभवों और क्रांतिकारी राजनीतिक कार्रवाइयों से यह नहीं समझ लेता है कि संसदीय जनतंत्र के परदे के पीछे पूँजी की तानाशाही काम करती है और कर रही है तथा संसदीय पार्टियाँ और इसके नेता चाहे जो लफ्फाजी कर लें, वे महज पूँजी अर्थात पूँजीपतियों के मुलाजिम से अधिक कुछ नहीं हैं, तब तक उनकी मुक्ति का रास्‍ता कतई नहीं खुलता होता है। तब तक उम्मीदों की कोई नई खिड़की नहीं खुलेगी। और इसीलिए उनके अच्‍छे दिन आने का भी कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता है।       
आम जनता की सबसे बड़ी और सबसे तात्कालिक जरूरत यह थी कि महँगाई पर रोक लगे, लेकिन मोदी सरकार ने इसके विपरीत महँगाई बढ़ाने का काम किया। रेल बजट को लें। रेल से जिंसों की ढुलाई की दर बढ़ाकर महँगाई के नये पर लगा दिए, जबकि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में कच्‍चे तेल की कीमतों में हुई भारी गिरावट के कारण मालभाड़े में और कमी किए जाने की वाजिब माँग उठ रही थी। रेल बजट में भले ही यात्री किराया नहीं बढ़ाया गया है, लेकिन बावजूद इसके हमारी जेबें हल्की होंगी। ऐसा हुआ है रेल बजट में मालभाड़े में बढ़ोतरी के प्रस्ताव से। विभिन्न जिंसों के लिए मालभाड़े में 10 पर्सेंट तक बढ़ोतरी के प्रस्ताव से खाद्यान्न, दालें, सीमेंट और इस्पात जैसी जरूरी चीजों के दाम बढ़ेंगे। ज्ञातव्य है कि रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने गुरुवार को संसद में पेश 2015-16 के रेल बजट में 12 जिंसों के भाड़े में 0-8 से 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी का प्रस्ताव किया है। इसके अलावा यूरिया पर मालभाड़े में 10 प्रतिशत बढ़ोतरी के प्रस्ताव से यूरिया दस दाम बढ़ेंगे इसके पूरे आसार हैं। भारतीय उर्वरक संघ (एफ.ए.आई) के महानिदेशक सतीश चंदर ने कहा है- 'मालभाड़े में बढ़ोतरी से यूरिया के लिए सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी में 300 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी होगी। अभी सरकार यूरिया पर तीन हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी देती है।' सीमेंट पर मालभाड़े में 2.7 पर्सेंट बढ़ोतरी का प्रस्ताव किया गया है। इसी तरह कोयले की ढुलाई पर भाड़े में 6.3 पर्सेंट, लौह एवं इस्पात पर 0.8 पर्सेंट, अनाज व दालों पर 10 पर्सेंट, मूंगफली तेल पर 2.1 पर्सेंट, एलपीजी पर 0.8 पर्सेंट व केरोसीन पर मालभाड़े में 0.8 पर्सेंट वृद्धि का प्रस्ताव किया गया है। लमिया भारत सीमेंट समूह के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मोहिंद्र सिंगी ने कहा है- 'हमारी उत्पादन की लागत 50 किलो के सीमेंट के बैग पर दो से चार रुपये बढ़ेगी।'
उसके एक दिन बाद ही अर्थात 28 फरबरी को लोकसभा में पेश आम बजट में वित्‍त मंत्री ने सेवा करों में 2 प्रतिशत की वृद्धि प्रस्‍तावित कर के लगभग सभी जरूरी सेवाओं के दाम बढ़ाने के संकेत दिए हैं। वहीं दूसरी तरफ कॉरपोरेट टैक्‍स में आगामी चार सालों में 5 प्रतिशत की कमी करने का एलान किया गया। इसके अतिरिक्‍त उन पर पहले से लगने वाले संपत्ति कर (वेल्‍थ टैक्‍स) को खत्‍म कर दिया गया है।      
 चंद महीने पहले की बातें याद कीजिए। पूँजीवादी मीडिया के मोदीमय चमत्कारी प्रचार ने कुछ ऐसा जादुई समां बांधा था कि लोगों ने यह भी देखने और समझने से इनकार कर दिया कि आखिर ऐसे महँगे प्रचार पर हो रहे अरबों के खर्च कौन और क्यों कर रहा है। यह इस बात का भी प्रमाण है कि राजनीतिक रूप से अप्रशिक्षित गरीब अवाम को झूठे वायदों, पूँजीवादी लटकों-झटकों और लज़ीज़ भाषणों के जरिए बहलाना-फुसलाना और उनसे उनके वोट झटक लेना कितना आसान होता है। यह वर्तमान 'जनतंत्र' की उस सीमा को भी दर्शाता है जो गरीबों और मेहनतकशों द्वारा इसके उपभोग किये जाने को लगातार बढ़ते पैमाने पर सीमित करती है। यह सीमा लगातार खींची जा रही है जो इस बात को सुनिश्चित करती है कि वर्तमान जनतंत्र में जनता के हाथ में कुछ भी नहीं रहे। वह कुछ भी तय न करे, यहाँ तक कि वोट देते वक्त भी उसके दिमाग में वे ही बातें हों जिन्हें पूँजीवादी मदारी अपने आकर्षक प्रचार के जरिए उसके दिमाग में ठुंसता है। पूँजी की प्रत्येक बढ़त के साथ जनतंत्र और भी बहुत तेजी से 'जन' से दूर होती जा रही है। यह सब दिखाता है कि ऐसे जनतांत्रिक राज्य में, जिसमें पूँजी बादशाह के पद पर आसीन होती है और पूँजी की ताकत सर्वोपरि हो जाती है, वैसे जनतंत्रों में पैसे के बल पर कोई भी सिद्धस्त बहुरुपिया बाज़ी मार ले जा सकता है. नरेन्द्र मोदी का उदय इस बात का पुख्‍ता और जीता-जागता प्रमाण है। इससे उपरोक्‍त जरूरी सबक लेकर आम अवाम को सरकारें नहीं व्‍यवस्‍था परिवर्ततन की लड़ाई में उतरने की ‍शीघ्र तैयारी करनी चाहिए।   ''सर्वहारा'' (New Series NO. 3)

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